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🌟 भगवान श्रीकृष्ण की सोलह दिव्य कलाएँ: जब ईश्वर स्वयं पूर्ण रूप में अवतरित हुए

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 "जब मनुष्य की सभी संभावनाएँ अपने शिखर पर पहुँच जाती हैं, तब एक पूर्णावतार जन्म लेता है। और वह थें – श्रीकृष्ण।" हिंदू धर्म में कई अवतारों की बात की जाती है, लेकिन जब बात पूर्णता की आती है, तो एक ही नाम आता है — भगवान श्रीकृष्ण। वे अकेले ऐसे अवतार माने जाते हैं जो सोलह कलाओं से युक्त थे, इसलिए उन्हें पूर्णावतार कहा जाता है। वहीं भगवान श्रीराम, जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं, बारह कलाओं के साथ इस धरती पर अवतरित हुए थे। इस लेख में हम जानेंगे कि वास्तव में ये "सोलह कलाएँ" क्या हैं?, और कैसे श्रीकृष्ण इन सभी दिव्य गुणों में परिपूर्ण थे। --- 🔱 "कला" का अर्थ: केवल चित्रकला या नृत्य नहीं यहाँ "कला" का अर्थ नृत्य, संगीत, चित्रकला जैसी कलाओं से नहीं है। "कला" का अर्थ है — मानव चेतना की पूर्णता, उसकी आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक, और आत्मिक क्षमता की चरम अवस्था। इन कलाओं के माध्यम से यह समझा जाता है कि ईश्वर जब स्वयं मानव रूप में अवतरित होते हैं, तो उनके भीतर क्या-क्या दिव्य गुण होते हैं। --- 🕉 श्रीकृष्ण की सोलह अलौकिक कलाएँ 1. श्री...