निरूपा रॉय: भारतीय सिनेमा की 'फिल्मी मां' का अमर सफर



भारतीय सिनेमा में जब भी 'मां' का जिक्र होता है, तो सबसे पहले जो चेहरा हमारी आंखों के सामने आता है, वह निरूपा रॉय का है। उनकी अदाकारी, उनकी ममता, और उनके द्वारा निभाए गए किरदारों ने उन्हें 'फिल्मी मां' के रूप में अमर बना दिया। लगभग पांच दशकों के अपने सुनहरे करियर में निरूपा रॉय ने 300 से अधिक हिंदी फिल्मों और 16 गुजराती फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरा। आइए जानते हैं, इस महान अभिनेत्री के जीवन और करियर से जुड़े कुछ अनछुए पहलू।

शुरुआती जीवन और बॉलीवुड में कदम

निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 को गुजरात के वलसाड में हुआ था। उनका असली नाम कोकिला किशोरचंद्र बुलसारा था। शादी के बाद वह अपने पति कमल रॉय के साथ मुंबई आ गईं। यहीं उनकी मुलाकात सिनेमा की दुनिया से हुई और 1946 में 'रनकदेवी' नामक गुजराती फिल्म से उनके अभिनय करियर की शुरुआत हुई। उनकी पहली हिंदी फिल्म 'अमर राज' (1946) थी।
उनकी शुरुआती पहचान धार्मिक फिल्मों से बनी। 'हर हर महादेव' और 'भक्त पूरनमल' जैसी फिल्मों में उन्होंने देवी-देवताओं की भूमिकाएं निभाईं और दर्शकों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई। इस कारण उन्हें 'देवी फिल्मों की रानी' कहा जाने लगा।

निरूपा रॉय: 'फिल्मी मां' की परिभाषा
1950 और 60 के दशक में निरूपा रॉय ने कई सामाजिक और पारिवारिक फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। हालांकि, 1970 के दशक में उनका करियर एक नया मोड़ लेता है, जब उन्हें बॉलीवुड की 'फिल्मी मां' के रूप में पहचाना जाने लगा। उनकी ममता और त्याग से भरी भूमिकाओं ने दर्शकों को भावुक कर दिया।

उनकी मशहूर फिल्मों में शामिल हैं:

'मां' (1976)


'अमर अकबर एंथोनी' (1977)


'मुकद्दर का सिकंदर' (1978)


'सुहाग' (1979)


'गंगा मेरी मां' (1982)


'गंगा जमुना सरस्वती' (1988)


खासकर, अमिताभ बच्चन की मां के रूप में उनका अभिनय अविस्मरणीय रहा। 'दीवार' में उनके किरदार ने यह साबित कर दिया कि एक मां का संघर्ष किसी भी नायक के संघर्ष से कम नहीं। उनका डायलॉग "मेरे पास मां है" आज भी सिनेमा प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है।

सम्मान और उपलब्धियां

निरूपा रॉय को अपने शानदार अभिनय के लिए कई पुरस्कार मिले। 1956 में उन्हें फिल्म 'मुनिमजी' के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। इसके बाद 'छाया' (1961) और 'शीराज़' (1965) में उनके प्रदर्शन के लिए भी उन्हें यह सम्मान मिला।
साल 2004 में, उन्हें उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 'फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित किया गया।

निजी जीवन और आखिरी दिन


अपने अभिनय जीवन में व्यस्त रहने के बावजूद, निरूपा रॉय अपने परिवार को प्राथमिकता देती थीं। उनके पति कमल रॉय, दो बेटे योगेश और किरण, और पोते-पोती उनके परिवार में शामिल थे। उन्होंने अपनी ननद की बेटी रेखा परमार को अपनी बेटी की तरह पाला और उसकी शादी भी की।

13 अक्टूबर 2004 को, 73 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके जाने के साथ ही भारतीय सिनेमा ने एक ऐसी अदाकारा को खो दिया, जो अपने ममता भरे अभिनय के लिए हमेशा याद की जाएंगी।

निरूपा रॉय की विरासत
निरूपा रॉय न केवल एक महान अदाकारा थीं, बल्कि वे भारतीय सिनेमा में ममता, त्याग और बलिदान का प्रतीक भी थीं। उनका योगदान हमेशा अमूल्य रहेगा। उनकी फिल्मों ने सिनेमा प्रेमियों के दिलों में जो जगह बनाई, वह कभी भुलाई नहीं जा सकती।
 


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